संवेदनशीलता की मात्रा कम और अधिक देना यह एक ‘प्राकृतिक व्यवस्था’ हैं जो मानव शरीर में कुछ हार्मोन्स के द्वारा संचालित होती हैं। परन्तु प्रकृति ने स्त्री या पुरुष किसी को भी संवेदनशीलता से पूर्णतः वंचित रखा हो ऐसा नहीं हैं। ठीक इसी तरह तार्किक बुद्धि भी दोनों को मिली हैं। हार्मोन्स ने सिर्फ प्राथमिकताएँ तय की हैं कि स्त्रियाँ ‘भावनाओं’ को तवज़्जो देंगी क्योंकि उन्हें पोषण देना हैं, क्योंकि उन्हें जीवन की कोमलताओं को सँभालने के दायित्व मिले हैं वहीँ पुरुष ‘तार्किकता’ को प्राथमिकता देते हैं ताकि जीवन को सुरक्षित रखने के दायित्वों को संभाल सकें।
पर यदि आप पुरुषों से संवेदनाएँ अनुभव करने के अधिकार छीनने का प्रयास करेंगे तो यह गलत हैं! ठीक इसी तरह यदि आप स्त्रियों से तर्क करने, निर्णय लेने के अधिकार छीनने या उन्हें दबाव में रखने का कार्य करते हैं तो यह अन्याय हैं।
यदि कहीं इस अन्याय का मुखर प्रतिकार होता न भी दिख रहा हो, वहां भी मन में विद्रोह अवश्य पनप रहा होता हैं और यही दबा हुआ विद्रोह कुण्ठा का रूप धरता हैं। कुण्ठाएं क्योंकि दबी हुई अतृप्त इच्छाएं होती हैं इसलिए उनका प्रकट होने का तरीका भी परोक्ष होता हैं।
यही कारण हैं कि हमें मूल पर काम करना होगा… genes में बसी इन कुंठाओं के पूरी तरह निकल जाने तक कार्य करना होगा। परिवर्तन आ रहा हैं और आएगा भी परन्तु जहाँ सोच बदलने में समय लगता हैं वहीं किसी सोच को ‘मिटने’ में युग लग जाया करते हैं इसलिए तब तक प्रतीक्षा कीजिए और प्रयास भी !
