डिप्रेशन – जब अपने ही भीतर रूठ जाये कोई!

मैं तो बहुत सहनशील हूँ, सब बर्दाश्त कर के भी रिश्ते निभाना आता हैं मुझे। ना-ना मैं कभी किसी को पलट कर जवाब नहीं देती! क्लेश नहीं शांति चुनती हूँ! किसी को तो रिश्तों की नींव बनना ही होगा न, जो रिश्तों की नींव बनेगा उसे तो अपनी इच्छाओं को अँधेरी जमीन में दफ़न करना ही होगा...यही स्त्री धर्म हैं और फिर नारी यूँ ही तो महान नहीं कहलाती! पर सच कहूं...तो सब-कुछ करते करते थकने लगी हूँ मैं. उदास रहती हूँ. कही बाहर जाने का मन नहीं करता...किसी से मिलने का मन नहीं करता। आजकल सुना हैं डिप्रेशन कहते हैं इसको। उदास तो कोई भी हो सकता हैं तो उदासी भी भला कोई रोग हुई?
डिप्रेशन आम सी उदासी हैं या भयंकर रोग? अगर यह प्रश्न आपका भी हैं तो ये जान लीजिये के डिप्रेशन दरअसल दो दोस्तों के एक दूजे से रूठ जाने की कहानी हैं। इन दोस्तों का अता-पता आपको दें, उस से पहले यह जान लेते हैं के ये नाराज़गी हैं कैसी...!

स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु – सत्य और तथ्य

“जो चीज़ प्रचुरता में ना मिले उसकी भूख बाक़ी रह जाती हैं”यह बात हमारे जीवन से जुड़ी हर वस्तु, हर भाव पर लागू होती हैं। ऐसे ही कुछ अति महत्वपूर्ण भाव हैं – सम्मान, स्वाभिमान, निजी निर्णय लेने की स्वतंत्रता जो…

जब डिप्रेशन उलझाए हर बात…इस तरह दें अपना साथ!

डिप्रेशन से जूझते वक़्त हर छोटी से छोटी बात भी चुनौती बन जाती हैं। काम पर जाना हो, रिश्तेदारियाँ निभानी हो, दोस्तों से मिलना हो यहाँ तक की सुबह बिस्तर छोड़ना भी एक दुष्कर कार्य बन जाता हैं। पिछली बार…

धरण (नाभि) खिसकना- सत्य और तथ्य!

“धरण” यह शब्द जन-जन के बीच जितना सामान्य हैं आधुनिक चिकित्सा विज्ञानं इस से उतनी ही दूरी बना कर रखता हैं। यहीं कारण हैं की जहाँ एक ओर हमारे घरों में दादी नानी के पास इसके कुछ इलाज उपलब्ध हैं…

डिप्रेशन- रोग या सिर्फ मन का वहम

“अब अपने दिल पे अब मेरी हुकूमत नहीं रही सियासत से अपनी, ये इलाका भी चला गया…” इश्क़? जी नहीं ये “डिप्रेशन” भी हो सकता हैं !! कितना जानते हैं आप डिप्रेशन को? आप कहेंगे डिप्रेशन यानि..  हर वक़्त की…

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