डिप्रेशन – जब अपने ही भीतर रूठ जाये कोई!

मैं तो बहुत सहनशील हूँ, सब बर्दाश्त कर के भी रिश्ते निभाना आता हैं मुझे। ना-ना मैं कभी किसी को पलट कर जवाब नहीं देती! क्लेश नहीं शांति चुनती हूँ! किसी को तो रिश्तों की नींव बनना ही होगा न, जो रिश्तों की नींव बनेगा उसे तो अपनी इच्छाओं को अँधेरी जमीन में दफ़न करना ही होगा...यही स्त्री धर्म हैं और फिर नारी यूँ ही तो महान नहीं कहलाती! पर सच कहूं...तो सब-कुछ करते करते थकने लगी हूँ मैं. उदास रहती हूँ. कही बाहर जाने का मन नहीं करता...किसी से मिलने का मन नहीं करता। आजकल सुना हैं डिप्रेशन कहते हैं इसको। उदास तो कोई भी हो सकता हैं तो उदासी भी भला कोई रोग हुई?
डिप्रेशन आम सी उदासी हैं या भयंकर रोग? अगर यह प्रश्न आपका भी हैं तो ये जान लीजिये के डिप्रेशन दरअसल दो दोस्तों के एक दूजे से रूठ जाने की कहानी हैं। इन दोस्तों का अता-पता आपको दें, उस से पहले यह जान लेते हैं के ये नाराज़गी हैं कैसी...!


